मेरे दो जुड़वाँ भाई थे | था, हम लोगों के इलाज कहाँ हो पाते हैं | घर पर ही जैसा-तैसा हो जाता था | रोटी तक भरपेट मिलती न थी, दवाई का पैसा कहाँ से आता | मेरे दो जुड़वाँ भाई थे | जिस दिन माँ आग में ताप रही थी, झुलस रही थी, उसी दिन उनमे से एक भाई घर पर आ गया था | दूसरा भाई वहीँ हास्टल में रह गया था | माँ को बचाने के प्रयास में भाई स्वयं भी जल गया था |माँ तो चल बसी | भाई जीवित रहा | पर अधिक दिनों तक नहीं | भाई के हाथ और छाती जल गई थी | समाया रहते इलाज हो जाता तो शायद बच जाता | गाँव में गरीबों को तब इलाज भी कहा मयस्सर होता था | पिताजी ने कहा भी था, हम लोगों के इलाज कहाँ हो पाते हैं | घर पर ही जैसा-तैसा हो जाता था | रोटी तक भरपेट मिलती न थी, दवाई का पैसा कहाँ से आता | |