वरदाता श्रीगणेश
प्रत्येक मनुष्यकी कोई-न-कोई कामना होती है। जिनको क्लेश है, वे क्लेश का नाश चाहते है, दूसरे ऐश्वर्य और भोग चाहते हैं । अपनी कामना पूर्ण करने के लिये लोग सभी प्रकार के प्रयत्न करते हैं,किंतु क्या कोई अपनी कामनाएँ दैव के सहारे के बिना पूरी कर सकता है ? कामनाओ ंका कोई अन्त ही नहीं है और ये हमें छोड़ती भी नहीं हैं । हमारे सारे लौकिक उपाय व्यर्थ हो गये और हमें तृप्ति नहीं मिली। कामनाओं का शमन करने के लिये और शान्ति पानेके लिये एक ही उपाय है - भगवान् की उपासना ।
भगवान उपासना अनादिकाल से चलती आ रही है। इससे जन-जन अपनी आत्मा को शान्ति प्रदान करता आ रहा है। उसकी आशाएँ भी बिना प्रयास के ही पूर्ण होती रहती हैं । हम भगवान् की उपासना कैसे करें, इसके लिये वेद और तन्त्रशास्त्र उपासना के बहुत-से मार्ग बतलाते आ रहे हैं । ये उपासनाएँ मन्त्रों के माध्यमसे चलती हैं । प्रत्येक मन्त्र के अलग-अलग देवता होते हैं। भगवान् तो एक ही हैं, फिर भी भक्तोंकी रक्षाके लिये वे नाना अवतार ग्रहण करते हैं । उन अवतारोमें विशिष्ट शक्ति और क्रियाएँ दृष्टिगोचर होती हैं । विशिष्ट शक्तियुक्त देवताओं की उपासना से हमारे अंदर विशिष्ट शक्तियां जाग्रत होती हैं और कार्यो में सिद्धि भी मिलती है ।
श्री गणेशजी भी भगवान के ही एक विशिष्ट स्वरूप हैं। वे पार्वती-शिवके पुत्र के रूप मेंं प्रकट हुए । इनकी उपासना कई प्रकार की है । इनके रूप भी अनेक हैं । रूप के अनुसार नाम भी भिन्न-भिन्न हैँ । जैसे - महागणपति, चिन्तामणि गणपति, हरिद्रागणपति इत्यादि । गणेशजीके बहुत-से मन्त्र हैं । तन्त्र-ग्रन्थों में मन्त्रों के पुरश्चरण-अनुष्ठान आदि की विधि विस्तार से प्रतिपादित है । विधिके अनुसार उनके अनुष्ठान करने से हम लौकिक और पारलौकिक फल प्राप्त कर सकते हैं । उनकी कृपा से मोक्ष तक की भी प्राप्ति होती है । विघ्रनिवारण के लिये गणेशजी सुप्रसिद्ध हैं। न केवल विघ्रविनाश ही, वरन प्रत्येक कामना भी इनकी उपासना से पूर्ण होती है । भारत का सनातन मतावलम्बी कोई भी व्यक्ति हो, किसी-न-किसी रूपमें इनका पूजन करता ही है । भारत के सभी घरों में समष्टि और व्यष्टिरूप में भाद्रपद-शुक्ल-चतुर्थी को इनका पूजन हुआ करता है । प्रत्येक मन्दिर में गणेशजी को हम देख सकते हैं । वह चाहे शिव-मन्दिर हो चाहे विष्णु-मन्दिर या कोई अन्य मन्दिर, गणेशजी सबको अभीष्ट हैं । देवों की पूजा या किसी अन्य मङ्गल-कार्य को करते समय सर्वप्रथम इनकी पूजा आवश्यक होती है । श्रीगणेश-पूजनके बिना किसी कार्यका आरम्भ ही नहीं हो सकता। शास्त्रों में सर्वप्रथम इनका पूजन विहित है। सारे शांकर मतानुयायी लोग पञ्जायतन-पूजन करते हैं । उस पञ्जायतनमें शिव, नारायण, सूर्य, देवी और गणेशजी हैं । गणेश भक्त इन देवों में गणेशजी को प्रधानता देकर उनकी पूजा करते हैं । व्यास जी ने महाभारत लिखते समय अन्य किसी को इस कार्य के लिये समर्थ न पाकर इन्हीं से उसे लिखने के लिये प्रार्थना की थी । इन्होंने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और व्यासजी जैसे-जैसे कहते गये, वैसे-वैसे ही गणेशजी लिखते गये।
विनायकजी के विषय में पुराणोंमें बहुत-सी रोचक कथाएँ वर्णित हैं और कुछ अन्य परम्परा से भी सुनी जाती हैं । गणेशजी के मन्त्र बहुत-से हैं । उन्हें गुरूमुख से जानकर दीक्षापूर्वक ग्रहण करने से ही उनका फल मिलता है । इनमें से कुछ मन्त्र तो ऐसे भी हैं, जिनका उपदेश लिये बिना भी इनका पाठ और जप कर सकते हैं । जो लोग उपदेश न पा सकें वे गणपति-सहस्त्र-नामावली, अष्टोत्तरशत-नामावली या द्वादश नामावली अथवा गणेश के स्तोत्र-पाठादि कर सकते हैं ।
उनकी द्वादशनामावली इस प्रकार है - 1- सुमुखाय नम:, 2- एकदन्ताय नम:, 3- कपिलाय नम:, 4- गजकर्णकाय नम:, 5- लम्बोदराय नम:, 6- विकटाय नम:, 7- विघ्रनाशाय नम:, 8- विनायकाय नम: 9- धूम्रकेतवे नम:, 10 - गणाध्यक्षाय नम: 11- भालचन्द्राय नम:, 12- गजानानाय नम: । इन नामोंसे दूर्वा चढ़ानेसे श्रीगणेशजीकी कृपा प्राप्तकर आप अपनी सभी कामनाएँ सफल बना सकते हैेेें --
नमस्तस्मै गणेशाय ब्रह्यविद्याप्रदायिने ।
यस्यागस्त्यायते नाम विघ्रसागरशोषणे ।।